न्याययोचित, बात करने वाले पुलिसकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार क्यों?

यूं भी पुलिस की नौकरी बहुत कठिन होती जा रही है जरा अन्दाजा लगाइये कि एक पुलिस चौकी प्रभारी जो नाइट ड्यूटी हो या दिन में कभी अगर बीमार पड़ जाए या उनके परिवार में बीमार हो जाए उसके बाद भी बैठकर पर्चा काटता है
आवाज़ -ए -लखनऊ (आर सी राठौर, संपादक )
लखनऊ ; उत्तर प्रदेश प्राय: यह देखने में आता है कि पुलिसकर्मी न चाहते हुए भी ‌रूपये के चक्कर में फंसते हैं रु मांगने का आरोप किसी भी पुलिसकर्मी पर बड़ी आसानी से लगते है और पुलिसकर्मियों पर लगे इन झूठे आरोपों पर पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी भी ज़्यादा कुछ नही कर सकते अलावा सम्बंधित पुलिसकर्मी के विरूद्ध कार्यवाही करने के आलावा पुलिस के उच्चाधिकारियोँ की भी मजजबूरी है उन्हें भी जवाब देना होता है यूं भी पुलिस की नौकरी बहुत कठिन होती जा रही है जरा अन्दाजा लगाइये कि एक पुलिस चौकी प्रभारी जो नाइट ड्यूटी हो या दिन में कभी अगर बीमार पड़ जाए या उनके परिवार में बीमार हो जाए उसके बाद भी बैठकर पर्चा काटता है
जबकि उसकी पत्नि या बच्चे परेशानी में होते है उस वक्त चौकी प्रभारी के दिल पर क्या बीतती होगी ऐसे उसके दिल से पूछे उच्चाधिकारी इस तरह के कई उदहारण हैं होली ईद जनता अपने घरों में चैन से त्यौहार मनाती है पर पुलिसकर्मी अपने परिवार से दूर आम जनता की सुरक्षा कर रहा होता है इस तरह से अगर देखा जाए तो पुलिस की ड्यूटी और सरकारी नौकरियों की अपेक्षा अधिक कठिन है इसलिए कम से कम उत्तर प्रदेश सरकार को पुलिसकर्मियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए न्याययोचित बात करने वाले पुलिसकर्मियों से जनता को अभद्रतापूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए।

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